एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है: भारत के ज्यादातर बैंक ऐप्स और वेबसाइट्स में ‘डार्क पैटर्न’ नाम की छुपी हुई धोखाधड़ी वाली डिज़ाइन तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं। ये तकनीकें यूज़र्स को बिना उनकी पूरी जानकारी या सहमति के अतिरिक्त चार्जेस, प्रोडक्ट्स या सर्विसेज खरीदने के लिए मजबूर करती हैं। क्या आप भी रोज़ाना बैंकिंग ऐप इस्तेमाल करते हुए इनका शिकार हो रहे हैं?
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डिजिटल सुविधा के नाम पर अगर पारदर्शिता खत्म हो जाए, तो भरोसा भी टूटता है। बैंकिंग का आधार विश्वास है, चालाक डिज़ाइन नहीं। यह मामला सिर्फ टेक्निकल सुधार का नहीं, नैतिक जिम्मेदारी का है। जागरूक ग्राहक ही सबसे बड़ी ताकत हैं। सवाल पूछिए, शर्तें पढ़िए और अपने वित्तीय निर्णयों पर पूरा नियंत्रण रखिए — क्योंकि आपका पैसा, आपका अधिकार है।
देशव्यापी सर्वे ने खोली पोल
24 फरवरी 2026 को जारी लोकलसर्कल्स (LocalCircles) के एक बड़े सर्वे ने इस समस्या की गहराई को उजागर किया है। यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वे है, जिसमें 388 जिलों से 1,61,000 से ज्यादा ऑनलाइन बैंकिंग यूज़र्स ने हिस्सा लिया। सर्वे में पाया गया कि अधिकांश बैंक अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर औसतन 4 से 7 डार्क पैटर्न इस्तेमाल कर रहे हैं।
सबसे आम शिकायतें इस प्रकार हैं:
- 64% यूज़र्स ने ‘ड्रिप प्राइसिंग’ की शिकायत की – यानी ट्रांजेक्शन के दौरान छुपे हुए चार्जेस जो बाद में कट जाते हैं, पहले नहीं बताए जाते।
- 57% ने ‘बास्केट स्नीकिंग’ का सामना किया – चेकआउट के समय बिना स्पष्ट सहमति के अतिरिक्त फीस या सर्विसेज डाल दी जाती हैं।
- 51% यूज़र्स को ‘फोर्स्ड एक्शन’ का सामना करना पड़ा – बेसिक ट्रांजेक्शन पूरा करने के लिए अनावश्यक सर्विसेज में साइन-अप या ज्यादा पर्सनल डेटा देना पड़ता है।
- 46% ने ‘नैगिंग’ की बात कही – बार-बार क्रेडिट कार्ड, इंश्योरेंस या अन्य प्रोडक्ट्स एक्टिवेट करने के लिए परेशान किया जाता है, भले ही यूज़र ने मना कर दिया हो।
इस सर्वे में ICICI बैंक, HDFC बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक जैसे 16 प्रमुख बैंकों के यूज़र्स ने ऐसी प्रैक्टिसेज की रिपोर्ट की। कई यूज़र्स ने कहा कि अकाउंट बंद करना खोलने से कहीं ज्यादा मुश्किल है, और सर्विसेज से ऑप्ट-आउट करना एक भूलभुलैया जैसा लगता है।
आरबीआई ने लिया सख्त रुख
इस सर्वे और उपभोक्ता शिकायतों के बाद रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 11 फरवरी 2026 को ‘Responsible Business Conduct Amendment Directions, 2026’ का ड्राफ्ट जारी किया। इसमें सभी बैंकों को 1 जुलाई 2026 तक अपने ऐप्स और वेबसाइट्स से सभी डार्क पैटर्न हटाने का आदेश दिया गया है।
आरबीआई के नए नियमों में शामिल हैं:
- फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स की जबरदस्ती बंडलिंग (जैसे लोन के साथ इंश्योरेंस) पर रोक।
- हर सर्विस के लिए स्पष्ट और अलग-अलग ग्राहक सहमति अनिवार्य।
- मिस-सेलिंग (गलत तरीके से प्रोडक्ट बेचना) पर पूर्ण रिफंड और नुकसान की भरपाई।
- ग्राहकों को अनुपयुक्त प्रोडक्ट्स नहीं बेचे जा सकते।
यह ड्राफ्ट मार्च की शुरुआत तक पब्लिक फीडबैक के लिए खुला है और जुलाई 2026 से लागू होगा।
वित्त मंत्री ने भी दी चेतावनी
22 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि मिस-सेलिंग “भरतीय न्याय संहिता के तहत अपराध” है। उन्होंने बैंकों को चेतावनी दी कि वे इसे जारी नहीं रख सकते। “मैं खुश हूं कि आरबीआई मिस-सेलिंग पर गाइडेंस ला रहा है… बैंकों को संदेश जाना चाहिए कि वे मिस-सेल नहीं कर सकते,” उन्होंने कहा। उन्होंने बैंकों से अपने कोर बिजनेस – डिपॉजिट और लोन – पर फोकस करने को कहा।
क्या होगा आगे?
लोकलसर्कल्स ने चेतावनी दी है कि कई बैंकों के डिजिटल प्लेटफॉर्म 20 साल पुराने हैं और बदलाव में समय लगेगा। जुलाई 2026 की डेडलाइन बैंकों के लिए बड़ी चुनौती होगी। क्या बैंक समय पर बदलाव कर पाएंगे? क्या आरबीआई सख्ती से लागू करवाएगा? यह सवाल अभी बाकी हैं।
लेकिन अच्छी खबर यह है कि अब उपभोक्ताओं के हक की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाए जा रहे हैं। अगर आपको भी बैंक ऐप में ऐसी कोई समस्या आ रही है, तो अपनी शिकायत दर्ज कराएं – क्योंकि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है।
(स्रोत: लोकलसर्कल्स सर्वे, आरबीआई ड्राफ्ट दिशानिर्देश, विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स – फरवरी 2026)